पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त |piaget’s cognitive development theory : जीन पियाजे एक प्रमुख स्विस मनोवैज्ञानिक थे। जिन्होंने अल्फ्रेड बिने के साथ बुद्धि परीक्षणों में कार्य किया है। उन्होंने बालकों के संज्ञानात्मक विकास पर कार्य किया।तत्पश्चात संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त | piaget’s cognitive development theory

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पियाजे के संज्ञानात्मक विकास को चार मुख्य अवस्थाओं में बांटा गया है।

  • 1.इंद्रिय जनित गामक अवस्था ( sensory-motor stage) (0-2 साल)
  • 2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था( pre- operational stage) (2-7 साल)
  • 3.मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (concrete operational stage ) (7-11साल)
  • 4.अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था( formal operational stage) (11-15 साल)

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(1) इन्द्रीयजनित गामक अवस्था(Sensory – motor stage)

यह अवस्था जन्म से 2 वर्ष की अवधि में पूरी होती है। इस अवस्था में वह अपनी मानसिक क्रियाओं को अपनी इंद्रिय जनित का क्रियाओं के रूप में प्रकट करता है।

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शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर करना किसी चीज को पकड़ना, अपने भावों को रोककर व्यक्त करना ,जो चाहिए, उसे दिखाकर अपनी बात कहना इसके प्रमुख लक्षण है।

इस अवस्था में किसी वस्तु का अस्तित्व तब तक रहता है। जब तक कि बालक के सामने वह वस्तु उपस्थित रहती है।

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage)

यह अवस्था 2 से 7 वर्ष की होती है। इसमें भाषा का विकास ठीक प्रकार से प्रारंभ हो जाता है। इसमें किसी बात की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा होता है।

बालक इस अवस्था में संप्रत्यय निर्माण करने लगता है। बालक वस्तुओं को पहचानना और उसमें विभेद करने लगता है । परंतु किसी वस्तु के संदर्भ में संप्रत्यय निर्माण अधूरा व दोषपूर्ण होता है।

इस अवस्था में बालक सजीव और निर्जीव में भेद करने लगता है।

इस अवस्था के दो प्रमुख दोष निम्न में हैं

(1)जीववाद(Animism) :

जीववाद बालकों के चिंतन में पाए जाने वाला वह दोष है। जिसमे वह निर्जीव को सजीव समझता है।

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जैसे- पंखा , कार, बादल सभी को सजीव समझता है।

(2) आत्मकेंद्रीयता:

बालक के विचार में व्यक्तिनिष्ठता पाई जाती है। वह सिर्फ अपने विचार को ही सत्य मान्यता है।

जैसे वह यह मानता है कि जैसे जैसे वह दौड़ता है वैसे वैसे सूर्य भी तेज दौड़ने लगता है। यह दोनों दोष से 2- 4 वर्ष की अवधि में पाए जाते हैं।

4-7 वर्ष में बालको का चिंतन पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है। परंतु चिंतन में उत्क्रमणीय गुण नहीं होती।

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था:(Concrete operational stage)

यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होते हैं।इस अवस्था में बालक वस्तुओं को पहचानना, विभेद करना ,वर्गीकरण द्वारा समझना सीख जाता है।

परंतु बालक उनका समस्या समाधान अमूर्त आधार पर नहीं कर पाता है। बल्कि वह उसका समाधान स्थूल या मूर्त कर पाता है।

अगर कोई व्यक्ति किसी समस्या को समझा रहा है। तो वह उस समस्या को नहीं समझ पायेगा। वह किसी समस्या को देख कर ही समझ पाता है।

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(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Formal operational stage)

यह अवस्था 11 से 15 वर्ष के बीच होती है इसमें किशोरों का चिंतन अधिकतम लचीला व प्रभावी हो जाता है। चिंतन में क्रमबद्धता पाई जाती हैं। चिंतन में वस्तुनिष्ठता व वास्तविकता पाई जाती है। अवस्था में बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है।

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